"कुत्तों से प्यार करते हैं, लेकिन मुर्गी, बकरी और मछली के लिए हमारे दिल में दया क्यों नहीं? क्या प्यार और करुणा भी हमारी पसंद के हिसाब से होती है?" आज मैं एक ऐसे विषय पर बात करना चाहती हूँ, जिस पर शायद हम सभी को एक बार जरूर सोचना चाहिए। अक्सर कहा जाता है कि मांस खाने से प्रोटीन मिलता है। यह सच है कि मांस प्रोटीन का एक स्रोत है, लेकिन क्या प्रोटीन पाने के लिए किसी जीव की जान लेना ही एकमात्र विकल्प है? हमारे भारत में दालें, चना, राजमा, सोयाबीन, मेवे और कई दूसरे शाकाहारी खाद्य पदार्थ भी उपलब्ध हैं, जिनसे प्रोटीन मिल सकता है। तो फिर एक सवाल उठता है—क्या हमें अपने भोजन के चुनाव में दूसरे जीवों के जीवन और पीड़ा के बारे में भी नहीं सोचना चाहिए? नवरात्रि और कई शुभ अवसरों पर बहुत से लोग आस्था और अहिंसा की भावना से मांसाहार नहीं करते। लेकिन क्या जीवों के प्रति दया केवल कुछ खास दिनों तक ही सीमित रहनी चाहिए? जरा सोचिए… जिन बेजुबान जीवों की आवाज हम नहीं समझ पाते, क्या उनकी पीड़ा का कोई महत्व नहीं है? क्या उन्हें भी इस धरती पर जीने का अधिकार नहीं है? एक बात और है, जो मुझे सोचने पर मजबूर कर...
नौ दिनों तक बेटी देवी है, तो बाकी दिन क्या है? नवरात्रि में जिस बेटी के पैर छूकर हम आशीर्वाद लेते हैं, क्या उसी बेटी के जन्म पर किसी माँ को ताने देना सही है? 🙏 माँ दुर्गा सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें। आजकल नवरात्रि की धूम पूरे देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी देखने को मिल रही है। हर तरफ माँ दुर्गा की भक्ति, कन्या पूजन और बेटियों के सम्मान की बातें हो रही हैं। यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि इन नौ दिनों में लोग बेटियों को देवी का रूप मानकर उनका आदर-सत्कार करते हैं। लेकिन मन में एक सवाल उठता है... क्या बेटियों का सम्मान सिर्फ नवरात्रि के नौ दिनों तक ही सीमित रहना चाहिए? हमारे समाज में आज भी ऐसे परिवार हैं, जहाँ एक बेटी होने के बाद दूसरी संतान भी बेटी होने पर परिवार के कुछ लोग निराश हो जाते हैं। कई बार उस माँ को ताने सुनने पड़ते हैं। कहा जाता है, "काश, एक बेटा हो जाता!" लेकिन जरा सोचिए, उस माँ पर क्या बीतती होगी, जिसने एक बेटी को जन्म दिया है और फिर भी उसे समाज की अपेक्षाओं के कारण ताने सुनने पड़ते हैं? जिस समाज में बेटियों को नौ दिनों तक माँ दुर्गा का रूप मान...