नौ दिनों तक बेटी देवी है, तो बाकी दिन क्या है? नवरात्रि में जिस बेटी के पैर छूकर हम आशीर्वाद लेते हैं, क्या उसी बेटी के जन्म पर किसी माँ को ताने देना सही है? 🙏 माँ दुर्गा सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें। आजकल नवरात्रि की धूम पूरे देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी देखने को मिल रही है। हर तरफ माँ दुर्गा की भक्ति, कन्या पूजन और बेटियों के सम्मान की बातें हो रही हैं। यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि इन नौ दिनों में लोग बेटियों को देवी का रूप मानकर उनका आदर-सत्कार करते हैं। लेकिन मन में एक सवाल उठता है... क्या बेटियों का सम्मान सिर्फ नवरात्रि के नौ दिनों तक ही सीमित रहना चाहिए? हमारे समाज में आज भी ऐसे परिवार हैं, जहाँ एक बेटी होने के बाद दूसरी संतान भी बेटी होने पर परिवार के कुछ लोग निराश हो जाते हैं। कई बार उस माँ को ताने सुनने पड़ते हैं। कहा जाता है, "काश, एक बेटा हो जाता!" लेकिन जरा सोचिए, उस माँ पर क्या बीतती होगी, जिसने एक बेटी को जन्म दिया है और फिर भी उसे समाज की अपेक्षाओं के कारण ताने सुनने पड़ते हैं? जिस समाज में बेटियों को नौ दिनों तक माँ दुर्गा का रूप मान...
हाल ही में एक बेहद दुखद घटना सामने आई, जिसमें परमानंद महाराज जी के एक शिष्य से जुड़ी बात सामने आई। इसके बाद मीडिया के कुछ हिस्सों और कई संतों की प्रतिक्रियाओं में परमानंद महाराज जी की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इस पूरे विषय को लेकर मेरी व्यक्तिगत सोच थोड़ी अलग है। मेरा मानना है कि किसी भी घटना का मूल्यांकन करते समय हमें भावनाओं के साथ-साथ तथ्यों और व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को भी अलग-अलग समझने की आवश्यकता है। एक गुरु के पास अनेक लोग आते हैं। कोई उनसे दीक्षा लेता है, कोई मार्गदर्शन प्राप्त करता है और कोई उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करता है। लेकिन प्रत्येक शिष्य अपने जीवन में लिए गए निर्णयों, अपने व्यवहार और अपने कर्मों के लिए स्वयं भी जिम्मेदार होता है। इसे मैं एक सरल उदाहरण से समझाना चाहती हूँ। मान लीजिए, एक शिक्षक की कक्षा में 100 से अधिक विद्यार्थी हैं। शिक्षक सभी बच्चों को एक ही पाठ पढ़ाते हैं। उन्हीं में से कोई बच्चा कक्षा में प्रथम आता है, कोई बहुत अच्छा प्रदर्शन करता है, कोई औसत अंक प्राप्त करता है और कोई परीक्षा में असफल भी हो जाता है। तो क्या केवल किसी बच्चे ...